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प्राइमरी टीचर से आईएएस बनीं सीरत जैसा जीवट हर किसी के वश का नहीं

प्राइमरी टीचर से आईएएस बनीं सीरत जैसा जीवट हर किसी के वश का नहीं

Tuesday September 10, 2019 , 4 min Read

रोजाना तीस किलो मीटर बस से, फिर आठ किलो मीटर पैदल सफर तय कर तमाम विपरीत परिस्थितियों में प्राइमरी टीचर से आईएएस बन चुकीं सीरत फ़ातिमा जैसा जीवट हर किसी के वश का नहीं। अपने लेखपाल पिता का सपना पूरा करने के लिए 'मांझी द माउंटेन मैन' फिल्म से प्रेरित सीरत के कदम मंजिल पर पहुंचकर ही थमे।

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सीरत फातिमा (फोटो: सोशल मीडिया)


आज इंडियन एंड ट्रैफिक सर्विस में तैनात इलाहाबाद (उ.प्र.) के गांव जसरा के पवर की आईएएस सीरत फातिमा कभी प्राइमरी स्कूल की टीचर हुआ करती थीं। उनको दो साल पहले यूपीएससी एग्जाम में 2017 में चौथे अटेंप्ट 810वीं रैंक हासिल हुई थीं। सीरत अपने चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। पेशे से पटवारी पिता का सपना था कि सीरत उनके आला अफसरों की तरह ही किसी बड़े ओहदे वाली अधिकारी बनें। मामूली सी नौकरी में जब उन्हें अफसरों की डांट खानी पड़ती तो वह झल्ला उठते थे। अफसरों के सामने अक्सर ही जलालत झेलने वाले पिता ने बेटी सीरत को उसी वक्त बड़ा अफसर बनाने का सपना पाल लिया था, जब वह महज चार साल की थी।


प्राइमरी स्कूल में टीचिंग के दौरान ही सीरत ने अपने पिता का सपना एक दिन आहिस्ते से भांप लिया और टीचिंग की ट्रेनिंग करती हुई संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भी बैठने की तैयारी में जुट गईं। ज़िंदगी में तमाम उतार-चढ़ाव देखने वाली सीरत को नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फिल्म `मांझी द माउंटेन मैन` से ऐसी प्रेरणा मिली कि उनके कदम मंज़िल तक पहुंचकर ही रुके। सच भी है कि कोई भी व्यक्ति अगर शिद्दत से कुछ ठान ले तो उसके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं रह जाता है। 


सीरत फातिमा की कामयाबी इस सोच को चरित्रार्थ करती है। सीरत का परिवार इलाहाबाद शहर के करेली इलाके में रहता है। उनके पिता अब्दुल गनी इलाहाबाद की मेजा तहसील में लेखपाल हैं और मां गृहिणी। सीरत की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई घूरपुर के सेंट मेरीज कॉन्वेंट स्कूल से हुई है।


इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद सीरत बीटीसी की ट्रेनिंग करने लगीं। नुमायाडीह कौड़िहार में प्राथमिक स्कूल में सेवारत रहने के दौरान 31 दिसंबर 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में आरओ के पद पर तैनात आदिल के साथ उनका निकाह भी कर दिया गया। उन दिनो उनके लिए घर-परिवार, अध्यापन और यूपीएससी एग्जाम की तैयारी के बीच सामंजस्य बैठाना कोई आसान काम नहीं था।





टीचर की नौकरी, फिर शादी और घर-परिवार के बीच सीरत ने आईएएस बनने का पिता का ख्वाब संजोए रखा। उन्हें उम्मीद थी कि वह आईएएस बनेंगी और आखिरकार अपने चौथे प्रयास में उन्होंने वह उपलब्धि हासिल कर ही ली। लगातार तीसरी बार भी परीक्षा देने के बाद जब सीरत को सफलता नहीं मिली तो वह दबाव भी बर्दाश्त कर गईं, जब घरवालों ने उनके लगातार तीसरे अटेंप्ट में भी असफल रहने पर उनको शादी कर लेने की सलाह दी। वह लाख दबावों के बावजूद घर वालों की मंशा भी नहीं ठुकरा सकीं। 


इस दौरान इतने ऊंचे मोकाम तक पहुंचने में सीरत को तमाम तरह के पापड़ बेलने पड़े। मुश्किलें भी इतनी अजीब कि उन्हे पूरी तरह प्राइमरी टीचर की ट्रेनिंग के साथ करनी पड़ी। उन्हे कोचिंग लेने तक की भी फुर्सत नहीं थी। वह बस से रोज़ाना तीस किलोमीटर दूर यूनिवर्सिटी पहुंचतीं, साथ ही नौकरी करने के लिए प्राइमरी स्कूल तक का आठ किलोमीटर का सफर पैदल तय करने लगीं। उस दौरान उनके तीन अटेंप्ट तो निष्फल गए। इंटरव्यू तक पहुंचकर भी सेलेक्ट नहीं हो सकीं।


वर्ष 2016 में तो सीरत मात्र छह अंक कम होने के कारण सेलेक्ट होने से रह गई थीं लेकिन उसके कुछ दिन बाद ही प्रीलिम्स परीक्षा में उनके पिता के सपने से कुछ ऐसा संबल मिला कि तमाम दबावों के बावजूद वह आईएएस सेलेक्ट हो गईं। जिस दिन वह अपने मकसद में कामयाब हुईं, उनके लेखपाल पिता की आँखों से आंसू छलक पड़े थे। पिता को जिन अफसरों के सामने पड़ने पर डर लगने लगता था, बेटी की सफलता पर वही उनको फोन पर बधाई देते नहीं थके।