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उस पाकीजा की कहानी जिसे इस पितृसत्तात्मक समाज ने मार डाला

उस पाकीजा की कहानी जिसे इस पितृसत्तात्मक समाज ने मार डाला

Tuesday August 01, 2017 , 6 min Read

मीना कुमारी ने तीन दशकों तक बॉलीवुड में अपनी दमदार अदाकारी से राज किया। उनके साथ हर कलाकार काम करने को बेताब रहा करता था, उनकी खूबसूरती ने सभी को अपना कायल बना लिया था। मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन और जज्बातों को कलमबंद किया। उनकी शायरी दिलों को कुरेद देने वाली हैं।

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मीना कुमारी ने छोटी उम्र में ही घर का सारा बोझ अपने कंधों पर उठा लिया। सात साल की उम्र से ही फिल्मों में काम करने लगीं। वो बेबी मीना के नाम से पहली बार फिल्म फरजद-ए-हिंद में नजर आईं।

बैजू बावरा ने मीना कुमारी को बेस्‍ट एक्‍ट्रेस का फिल्‍म फेयर अवॉर्ड दिलवाया। वह यह अवॉर्ड पाने वाली पहली एक्‍ट्रेस थीं। इसके बाद भी उन्‍होंने एक से बढ़ कर एक फिल्में दीं। उनके कद का अंदाजा आप यूं लगाइए कि 1963 के दसवें फिल्‍मफेयर अवॉर्ड में बेस्‍ट एक्‍ट्रेस कैटेगरी में तीन फ़िल्में (मैं चुप रहूंगी, आरती और साहिब बीवी और गुलाम) नॉमिनेट हुई थीं और तीनों में मीना कुमारी ही थीं।

'ट्रेजडी क्वीन' के नाम से मशहूर मीना कुमारी ऐसी अभिनेत्री थीं, जिसके सामने 'ट्रेजडी किंग' दिलीप कुमार तक नि:शब्द हो जाते थे और अभिनेता राजकुमार तो सेट पर अपने डायलॉग ही भूल जाते थे। मीना कुमारी ने तीन दशकों तक बॉलीवुड में अपनी दमदार अदाकारी से राज किया। उनके साथ हर कलाकार काम करने को बेताब रहा करता था, उनकी खूबसूरती ने सभी को अपना कायल बना लिया था। मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन और जज्बातों को कलमबंद किया। उनकी शायरियां दिलों को कुरेद देने वाली हैं।

गर्दिशों से बुलंदियों की ओर

1 अगस्‍त, 1932 को मुंबई के डॉ गद्रे अस्पताल में इकबाल बेगम ने एक बेटी को जन्म दिया था, जिसे पहले अली बख्श ने कूड़ेदान में फेंक दिया था। फिर उसे उठाकर ले आए थे। यह बच्ची माहजबी थीं, जो कि बड़ी होकर मीना कुमारी बनी। मीना कुमारी ने छोटी उम्र में ही घर का सारा बोझ अपने कंधों पर उठा लिया। सात साल की उम्र से ही फिल्मों में काम करने लगीं। वो बेबी मीना के नाम से पहली बार फिल्म फरजद-ए-हिंद में नजर आईं। इसके बाद लाल हवेली, अन्‍नपूर्णा, सनम, तमाशा आदि कई फिल्में कीं। लेकिन उन्‍हें स्‍टार बनाया 1952 में आई फ़िल्म बैजू बावरा ने। इस फ़िल्म के बाद वह लगातार सफलता की सीढियां चढ़ती गईं।

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बेस्ट एक्ट्रेस की लिस्ट में खुद से ही था मुकाबला

बैजू बावरा ने मीना कुमारी को बेस्‍ट एक्‍ट्रेस का फिल्‍म फेयर अवॉर्ड दिलवाया। वह यह अवॉर्ड पाने वाली पहली एक्‍ट्रेस थीं। इसके बाद भी उन्‍होंने एक से बढ़ कर एक फिल्में दीं। उनके कद का अंदाजा आप यूं लगाइए कि 1963 के दसवें फिल्‍मफेयर अवॉर्ड में बेस्‍ट एक्‍ट्रेस कैटेगरी में तीन फ़िल्में (मैं चुप रहूंगी, आरती और साहिब बीवी और गुलाम) नॉमिनेट हुई थीं और तीनों में मीना कुमारी ही थीं। उन्हें यह अवॉर्ड 'साहिब बीवी और गुलाम' में उनके निभाए गए ‘छोटी बहू’ के किरदार के लिए मिला था। वैसे, मीना कुमारी ने अपने करियर में जितनी बुलंदियां हासिल की हैं निजी ज़िंदगी में उतनी ही मुश्किलें भी झेलीं। जन्‍म से लेकर अंतिम घड़ी तक उन्‍होंने दुख ही दुख झेला। कामयाबी का जश्‍न मनाने का वक्‍त आता, उससे पहले ही कोई न कोई हादसा उनका पीछा करता ही रहता।

पुरुषवादी कट्टरता ने ले ली एक महान अदाकारा की जान

लोग मीना कुमारी को ट्रेजडी क्वीन समझते हैं। लोगों को मीना कुमारी की शराब की लत व कई पुरूषों के साथ अफेयर की बात पता है। पर किसी को भी इसकी वजह पता नही हैं। किसी ने उनके दर्द को नहीं जाना। निजी जीवन की तमाम समस्याओं ने उन्हें ऐसा बनाया था। जिन समस्याओं से मीना कुमारी अपनी निजी जिंदगी में जूझ रही थीं, उन समस्याओं से आज की भारतीय नारी भी जूझ रही है। मीना कुमारी के पास सुंदरता, धन, मान सम्मान, शोहरत सब कुछ था। उनके प्रशंसकों की कमी नहीं थी। लेकिन उनकी कोख सूनी थी। उन्हें अपने पति से आपेक्षित प्यार नहीं मिला। 

मीना कुमारी, कमाल अमरोही की तीसरी पत्नी थीं। कमाल नहीं चाहते थे कि मीना कुमारी उनके बच्चे की मां बनें। एक स्थापित अभिनेत्री का एक स्ट्रगल फिल्मकार कमाल अमरोही से शादी करने का फैसला प्यार पाने का सपना था। मगर कमाल उन्हें अपनी पत्नी के बदले एक सफल हीरोइन के रूप में देखते थे, जो उन्हें सफल निर्देशक बना सकती थी। कहा भी गया कि मीना ने पाकीजा में अभिनय नहीं किया होता तो कमाल अमरोही इतिहास के पन्नों में ही नहीं होते। कमाल अमरोही अक्सर मीना कुमारी की पिटाई किया करते थे। शायद यही वजह है कि एक जगह मीना कुमारी ने कमाल अमरोही के संबंध में लिखा था, 'दिल सा जब साथी पाया, बेचैनी भी वह साथ ले आया।'

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पाकीज़ा के सफर का दुखद अंत

हर तरफ से परेशान मीना कुमारी की रातें की नींद गायब हो गयी थी। तब उनके निजी डॉक्टर डॉ. सईद तिमुर्जा ने उन्हें रात में सोने से पहले एक पैग ब्रांडी दवा की तरह लेने की सलाह दी थी। पर धीरे-धीरे मीना कुमारी ने ब्रांडी की पूरी बोटल पीनी शुरू कर दी थी। फिल्म पाकीजा के रिलीज होने के तीन हफ्ते बाद, मीना कुमारी गंभीर रूप से बीमार हो गईं। 28 मार्च, 1972 को उन्हें सेंट एलिजाबेथ के नर्सिग होम में भर्ती कराया गया। मीना ने 29 मार्च, 1972 को आखिरी बार कमाल अमरोही का नाम लिया, इसके बाद वह कोमा में चली गईं। 

मीना कुमारी महज 39 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गईं। जब मीना कुमारी की मौत हुई, उस वक्त उनके पास अस्पताल का बिल भरने के भी पैसे नहीं थे।

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मौत को गले लगाने से पहले मीना कुमारी अपनी गजल व नज़्म की ढाई सौ डायरियां गीतकार गुलजार के नाम वसीयत करके गयीं। यह सभी डायरियां गुलजार साहब के पास हैं। 'मेरे अंदर से जो जन्मा है, वह लिखती हूं जो मैं कहना चाहती हूं वह लिखती हूं।' 

मीना कुमारी ने अपनी वसीयत में अपनी कविताएं छपवाने का जिम्मा गुलजार को दिया था जिसे गुलज़ार ने ‘नाज’ उपनाम से छपवाया। सदा तन्हा रहने वाली मीना कुमारी ने अपनी रचित एक गजल के जरिए अपने दिल के हाल को कुछ इस तरह बयां किया...

.. चांद तन्हा है आसमां तन्हा

दिल मिला है कहां कहां तन्हा

राह देखा करेगा सदियों तक

छोड़ जायेगें ये जहां तन्हा...

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