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जब क्रांतिकारियों के गीतों से खौफ में आ गई थी ब्रिटिश हुकूमत

साहित्य की इन विधाओं ने आजादी की लड़ाई में भी बहुत बड़ा योगदान दिया है। कई बार होता है कि अलग-अलग तरीके से अपनी बात सब तक पहुंचाने की कोशिश हर बार रंग नहीं लाती थी।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


कविता, गीत, तराने, नज्म, गजल; अपनी बात को गाकर रखने के लिए ऐसी इफेक्टिव विधाएं हैं, जो कभी-कभी बोल कर कहने से ज्यादा प्रभावशाली होती हैं। साहित्य की इन्हीं विधाओं ने आजादी की लड़ाई में काफी बड़ा योगदान दिया है

कई बार होता है कि अलग-अलग तरीके से अपनी बात सब तक पहुंचाने की कोशिश हर बार रंग नहीं लाती थी। अंग्रेजों के उस दौर में अपनी बात कह पाना इतना आसान नहीं था। ऐसे में क्रांतिकारियों ने अलग ही तरीके से लोगों तक बात पहुंचाने की योजना बनाई। भारत को जनश्रुतियों का देश कहा जाता है, हमें पढ़ने से ज्यादा सुनने में मज़ा आता है और अगर वह गाने की शक्ल में हों तो बात ही कुछ ओर होती है। ऐसी कई और प्रार्थनाएं और तराने थे, जिसने आज़ादी की लड़ाई में जान फूंक दी।

ऊपर सूरज उगता था नीचे आजादी के स्वर

खास बात यह थी कि इन तरानों को समझ पाना अंग्रेजों के लिए थोड़ा मुश्किल ही था। जब किसी गाने, तराने की आवाज ऊंची हो जाती तो अंग्रेज सकते में आ जाते। अगर कोई इंकलाबी गाना कईयों की जबान पर चढ़ जाता तो भयभीत अंग्रेज तुरंत उसको बैन कर देते। और गाना गाने वालों को जेल में ठूंसने लगते। जैसे-जैसे उनके अत्याचार बढ़ते वैसे-वैसे इन गीतों को गाने की ललक सबमें और बढ़ जाती। लोगों ने एक और अच्छा तरीका निकाल लिया था, प्रभातफेरी के गाना गाने का। ऐसे ही एक अनाम रचयिता का ये गाना सुबह होते ही लोगों में जोश भरने लगता,

'उठो सोने वालों, सवेरा हुआ है, वतन के फक़ीरों का फेरा हुआ है। चलो मोह की कालिमा धो रही है, न अब कौम कोई पड़ी सो रही है। तुम्हें किसलिए मोह घेरा हुआ है, उठो सोने वालों, सवेरा हुआ है।'

लोगों के दिलों में देशप्रेम को जगाते गीत

लोगों को गुलामी के नुकसान बताते हुए उनको ललकारने के लिए क्रांतिकारियों ने कई गीत रच डाले। ऐसा ही एक गीत 'भारत की आन' क्रांतिकारी रौशन ने लिखा था। रौशन वो धाकड़ क्रांतिकारी थे जिन्हें पकड़ने के लिए ब्रिटिश हुकुमत ने उस वक्त पूरी सीआईडी लगा दी थी। उन्होंने हिंदुस्तानियों को ललकारा था कि,

'आन भारत की चली इसको बचा लो अब तो, कौम के वास्ते दु:ख-दर्द उठा लो अब तो। देश के वास्ते गर जेल भी जाना पड़े, शौक से हथकड़ी कह दो कि लगाओ हमको।' 

यहां तक कि उस दौर में गाई जाने वाली लोरियां भी वीर रस से भरी होती थीं। अख़्तर शीरानी की ऐसी ही एक लोरी है, जिसकी लाइनें कुछ इस तरह हैं,

'वतन और क़ौम की सौ जान से ख़िदमत करेगा यह, खुदा की और खु़दा के हुक्म की ख़िदमत करेगा यह हर अपने और पराये से सदा उल्फत करेगा यह, हर इक पर मेहरबां होगा, मेरा नन्हा जवां होगा'

जब देश गुस्से से उबल उठा

13 अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला बाग कांड ने पूरे देश भर के लोगों के दिलों में गुस्से की आग लगा दी थी। अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। लाला लाजपत राय की हत्या और भगत सिंग, राजगुरु, सुखदेव जैसे केंद्रीय क्रांतिकारियों की फांसी ने तो इंतहा ही कर दी थी। इन सब पर लोगों को हुंकार क्रांतिकारी सरजू ने लिखा था,

'पेट के बल भी रेंगाया, जुल्म की हद पार की, होती है इस बार हुज्जत खत्म अब हर बार की।शोर आलम में मचा है लाजपत के नाम का, ख्वार करना इनको चाहा अपनी मिट्टी ख्वार की। जिस जगह पर बंद होगा शेरे-नर पंजाब का, आबरू बढ़ जाएगी उस जेल की दीवार की।'

इसी कारवां को आगे बढ़ाते हुए कमल ने अपने गीत देशभक्त के प्रलाप में लिखा था, 'हमारा हक है हमारी दौलत़ किसी के बाबा का जर नहीं है, है मुल्क भारत वतन हमारा, किसी की खाला का घर नहीं है। न देश का जिनमें प्रेम होवे, दु:खी के दु:ख से जो दिल न रोए, खुशामदी बन के शान खोए वो खर है हरगिज बशर नहीं है।'

भयभीत अंग्रेजों की कायराना हरकतें

'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है'। रामप्रसाद बिस्मिल की लिखी इस कालजयी नज्म आज भी लोगों के दिलों में देशप्रेम का जोश भर देती है। तो सोचिए गुलाम भारत में इस एक गीत ने किस कदर सबको ललकारा होगा। उनके इस गीत से तो बुझ चुके दिल में भी अंगारे लोटने लगें। और ऐसा ही हुआ था। बिस्मिल के इस गाने से अंग्रेज बिल्कुल बौखला गए थे। ये गीत काज़ी अब्दुल गफ़्फ़ार की पत्रिका सबाह में 1922 में छपी थी जिसके तुरंत बाद हीअंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।

उसी दरम्यान पंजाब और उसके आसपास के इलाकों में एक नाटक बहुत लोकप्रिय हो रहा था, 'हुल्ले हुलारे'। इस नाटक में एक गीत था, जिसके बोल थे 'कड्ड दियो अब फिरंगी नू, समंदरों पार फिरंगी नू।' इस पर अंग्रेजी शासन क स्थानीय अफसरों के होश उड़ गए थे। उन्होंने इस पर आपत्ति जताई, लेकिन नाटक का मंचन इस गीत के साथ जारी रहा। इससे नाराज अंग्रेजों ने इस नाटक की कर्ता धर्ता उमा देवी सहित नाटक में काम करने वाली सात लड़कियों को गिरफ्तार कर अमृतसर की जेल में बंद कर दिया। नाटक पर भी पाबंदी लगा दी गई। महिला नाटककर्मियों के साथ हुए अत्याचार के बाद इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि जगह-जगह नाटक का गीत 'कड्ड देयो अब फिरंगी नू' को लोगों ने क्रांति का नारा बना दिया।

ये सारे गीत, जिनमें से कुछ को लिखने वालों का हमें नाम तक नहीं पता, हमारे लिए एक धरोहर हैं। आजादी हम सबको बड़े बलिदानों और अथक प्रयासों से मिली है, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के इस उपहार को हम कभी अपने हाथों से जाने नहीं देंगे। हमेशा संभालकर रखेंगे।

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