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पढ़ना-लिखना नहीं जानतीं लेकिन आदिवासियों की खबर दुनिया तक पहुंचा रहीं जानकी अम्मा

पढ़ना-लिखना नहीं जानतीं लेकिन आदिवासियों की खबर दुनिया तक पहुंचा रहीं जानकी अम्मा

Friday January 18, 2019 , 4 min Read

जानकी अम्मा (तस्वीर साभार- न्यूजमिनट)

"जानकी जिस सामुदायिक समाचारपत्र के लिये काम करती हैं वह नीलगिरी में रहने वाले आदिवासी लोगों पर पूरी तरह से केंद्रित है और वे समुदाय को एकसाथ और सूचित रखने के उद्देश्य से आसपास के गावों से समाचारों को संकलित करती हैं।"

60 वर्षीय जानकी अम्मा नीलगिरी के एक सामुदायिक अखबार की संवाददाता हैं और सबसे रोचक बात यह है कि वे पढ़ना या लिखना भी नहीं जानतीं लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। जानकी अम्मा को पढ़ना या लिखना बिल्कुल भी नहीं आता। लेकिन उनकी यह अक्षमता भी उन्हें एक सामुदायिक समाचारपत्र सीमाई सुधि का पत्रकार बनने से नहीं रोक पाई। जानकी निश्चित करती हैं कि वे असली और जमीनी खबर देने के लिये आसपास के स्थित दुर्गम गांवों तक खुद जाएं।


नीलगिरी के आदिवासी समुदायों की खबर दुनिया के सामने लाने वाले अपने सहयोगियों में सबसे उम्रदराज यह संवाददाता बारिश या चिलचिलाती गर्मी की परवाह किये बिना अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी शिद्दत से करती हैं। किसी भी प्रकार की औपचारिक शिक्षा से महरूम रही जानकी अम्मा ने 2007 में कीस्टोन फाउंडेशन द्वारा स्थापित किये गए सामुदायिक अखबार सीमाई सुधि की संवाददाता के रूप में अपना करियर शुरू किया। यह फाउंडेशन नीलगिरी में रहने वाले स्थानीय समुदायों के साथ काम करता है।


जानकी जिस सामुदायिक समाचारपत्र के लिये काम करती हैं वह नीलगिरी में रहने वाले आदिवासी लोगों पर पूरी तरह से केंद्रित है और वे समुदाय को एकसाथ और सूचित रखने के उद्देश्य से आसपास के गावों से समाचारों को संकलित करती हैं।


इस पत्रकार की दिनचर्या सवेरे आठ बजे शुरू होती है और वे ऊंची-नीची चट्टानों और फिसलन भरे रास्तों से होकर आसपास के गांवों तक पैदल ही जाती हैं। द क्विंट के अनुसार अपने समाचारपत्र के लिये मिले काम को पूरा करने के चलते उन्हें आसपास के 22 गावों का दौरा करना पड़ता है। 


पढ़ने या लिखने में नाकाम जनकी कहती हैं कि वे अपने काम के लिये पूरी तरह से अपनी याद्दाश्त पर निर्भर हैं और उन्हें इसपर पूरा भरोसा है। उदाहरण के लिये वे यह याद कर लेती हैं कि किस गांव में क्या काम होना बाकी है जैसे बिजली, स्ट्रीट लाइट या फिर सड़क इत्यादि। इसके बाद जानकी सारी बातों को अपनी बेटी को सुनाती हैं जो इस सबको उनके लिये लिखने का काम करती हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि वे दफ्तर का रुख कर लेती हैं और सेल्वी को सीधे रिपोर्ट करती हैं जो नोट्स लिख लेती हैं।


दिलचस्प बात यह है कि कई बार गावों के इन दौरों के दौरान जानकी मामलों को अपने हाथों में भी ले लेती हैं। जैसे एक बार पानी से जुड़ी समस्या को सुलझाने के लिये इन्हें खुद बीच में आना पड़ा। द न्यूज़ मिनट के अनुसार, वे उस वाकये को याद करते हुए बताती हैं कि पंचायत अधिकारी को यह पसंद नहीं आया और उसने उनके व्यवस्था को दरकिनार करने को लेकर सवालात उठाये जिसके जवाब में जानकी ने कहा, ‘‘मैं सिर्फ अपना काम कर रही हूं।’’


अपने इस मासिक काम के अलावा जानकी को औषधीय जड़ी-बूटियों की अच्छा-खासा जानकारी है। हालांकि उन्हें इन पेड़-पौधों के नाम तो पता नहीं है लेकिन वे उन्हें देखते ही फट से यह बता देती हैं कि फलाना पौधा इस रोग के इलाज में काम आता है। गांव वाले भी छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज करने से लेकर गर्भवती महिलाओं की मदद करने वाली जानकी अम्मा की पूरी आवभगत करते हैं और उनकी ख्याल रखते हैं। वे कहती हैं, ‘‘मैंने अपनी सभी चार गर्भावस्थाओं का ध्यान खुद ही रखा। बच्चों की पैदाइश के समय किसी को भी अंदर आने की अनुमति नहीं थी।’’


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